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Friday, November 21, 2014

कहीं से बीज इमली के / कृष्ण शलभ

कहीं से बीज इमली के, कहीं से पर उठा लाई
ये बच्ची है बहुत खुश, एक दुनिया घर उठा लाई

दिसंबर छह से पहले प्यार से मिलती थी सलमा से
शहर को क्या गई, बूढ़ी बुआ तो डर उठा लाई

अमीरे शहर गाफ़िल ही रहा जिनकी ज़रूरत से
उन्हीं को रात में फुटपाथ के बिस्तर उठा लाई

किया क्या रात ने, हम पूस की सर्दी के मारे हैं
भला हो सुबह का, जो धूप की चादर उठा लाई

बड़ी मुद्दत से तनहा हूँ, पलट जिसने नहीं देखा
उसी की चीख अंदर से मुझे बाहर उठा लाई!

कृष्ण शलभ

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