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Friday, November 21, 2014

चढ़ने लगती है / अज्ञेय

ओ साँस! समय जो कुछ लावे

सब सह जाता है:
दिन, पल, छिन-इनकी झाँझर में जीवन
कहा-अनकहा रह जाता है।
बहू हो गयी ओझल:

नदी पार के दोपहरी सन्नाटे ने फिर

बढ़ कर इस कछार की कौली भर ली:
वेणी आँचल से रेती पर
झरती बूँदों की लहर-डोर थामे, ओ मन!
तू बढ़ता कहाँ जाएगा?

अज्ञेय

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