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Wednesday, December 31, 2014

हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है / अनवर जलालपुरी

हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है
कोई तालिब कोई मतलूब नहीं होता है

अब तो पहली सी वह तहज़ीब की क़दरें न रहीं
अब किसी से कोई मरऊब नहीं होता है

अब गरज़ चारों तरफ पाँव पसारे है खड़ी
अब किसी का कोई महबूब नहीं होता है

कितने ईसा हैं मगर अम्न-व-मुहब्बत के लिये
अब कहीं भी कोई मस्लूब नहीं होता है

पहले खा लेता है वह दिल से लड़ाई में शिकस्त
वरना यूँ ही कोई मजज़ूब नहीं होता है

अनवर जलालपुरी

हम भी हों यूँ परेशां और तुम भी पशेमां हो / आशीष जोग


हम भी हों यूँ परेशां और तुम भी पशेमां हो,
ऐ ज़िन्दगी हमारा ऐसा ना इम्तिहाँ हो |

माना के ये बोहोत है वो जानते हैं मुझको,
इसके भी आगे शायद कोई और भी जहाँ हो |

हम तुमसे हैं मुख़ातिब कहने दो दिल की बातें,
कल कौन जाने हम तुम किस हाल में कहाँ हों |

सोचा था जब मिलेंगे कह दूंगा दिल की बातें,
वो सामने खड़े हैं हमसे ना कुछ बयां हो |

जब जब भी मिले हम तुम कुछ दिल में उलझनें थीं,
ऐसे भी मिलें इक दिन जब कुछ ना दरमियाँ हो |

तन्हाई से हमारा है वास्ता पुराना,
ऐ काश रहगुज़र में ना साथ कारवां हो |

चेहरों पे कितने चेहरे दम घुट रहा यहाँ पर,
चल आज मुझे ले चल आवारगी जहाँ हो |

इस भीड़ में हूँ खोया मैं कैसे खुद को पाऊं,
कबसे पुकारता हूँ आवाज़ दो कहाँ हो |

जो कल में जी रहे हैं वो आज खो रहे हैं,
किसको पता है कब तक ये वक़्त मेहरबां हो |

ऐसा मुझे मकां दो जिसमें ना हों दीवारें,
नीचे ज़मीं हो ऊपर तारों का आसमां हो |

ग़र नाम है रिश्ते का तो वो नाम का है रिश्ता,
रिश्ता तो असल वो है कोई नाम जिसका ना हो |

अंदाज़-ए-बयाँ उनका मुश्किल है अब समझना,
ना हमको कह रहे हैं दिल में भले ही हाँ हो |

आशीष जोग

जियो तो ऐसे जियो / अनिता ललित

चढ़ो... तो आसमाँ में चाँद की तरह...
कि आँखों में सबकी... बस सको...
ढलो... तो सागर में सूरज की तरह...
कि नज़र में सबकी टिक सको...!

अनिता ललित

अमन की कोई आख़री गुंजाइश नहीं होती / उत्‍तमराव क्षीरसागर

हवाओं का झूलना
वक्‍़त - बेवक्‍़त
अपनी उब से, अपने हिंडोले पर


इन हवाओं को
मि‍ला होता रूख, तो ज़रूर जाती
कि‍सी षड्यंत्र में शामि‍ल नहीं होती


हवाओं में
लटकी हैं नंगी तलवारें
सफ़ेद हाथ अँधेरों के
उजालों की शक्‍ल काली


अमन की कोई आख़री गुंजाइश नहीं होती ।

                               - 1999 ई0

उत्‍तमराव क्षीरसागर

पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो / केशव.

पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो ।
सीठी तमूर खवाइबो खैबो विशेष चहूँ दिशि चौँकि चितैबो ।
चीर कुचीलन ऊपर पौढ़िबो पातहु के खरके भगि ऎबो ।
आँखिन मूँद के सीखत राधिका कुँजन ते प्रति कुँजन जैबो ।


केशव.का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

केशव (रीतिकालीन कवि)

रेंग रहे हैं साये अब वीराने में / आलम खुर्शीद

रेंग रहे हैं साये अब वीराने में
धूप उतर आई कैसे तहख़ाने में

जाने कब तक गहराई में डूबूँगा
तैर रहा है अक्स कोई पैमाने में

उस मोती को दरिया में फेंक आया हूँ
मैं ने सब कुछ खोया जिसको पाने में

हम प्यासे हैं ख़ुद अपनी कोताही से
देर लगाई हम ने हाथ बढ़ाने में

क्या अपना हक़ है हमको मालूम नहीं
उम्र गुज़ारी हम ने फ़र्ज़ निभाने में

वो मुझ को आवारा कहकर हँसते हैं
मैं भटका हूँ जिनको राह पे लाने में

कब समझेगा मेरे दिल का चारागर
वक़्त लगेगा ज़ख्मों को भर जाने में

हँस कर कोई ज़ह्र नहीं पीता आलम
किस को अच्छा लगता है मर जाने में

आलम खुर्शीद

सहज मिले अविनासी / कबीर

पानी बिच मीन पियासी।
मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ।।
आतम ग्यान बिना सब सूना, क्या मथुरा क्या कासी ।
घर में वसत धरीं नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी ।।
मृग की नाभि माँहि कस्तूरी, बन-बन फिरत उदासी ।
कहत कबीर, सुनौ भाई साधो, सहज मिले अविनासी ।।

कबीर

तू अब भी वही पुजारिन / अनिल पाण्डेय

समझने लगी है यह दुनिया, माता तू हत्यारिन
नहीं समझता कोई ऐसा तू अब भी वही पुजारिन
लड़की क्या, क्या होता बेटा सबको ममता देती है
साल-साल भर कोख में रखकर महाकर्म तू करती है
  
जनती जब तू लड़का तो घर वाले भी ख़ुश होते हैं
अन्यथा लड़की होने पर असह्य ताड़ना देते है
सास-श्वसुर के ताने-बाने, पति अवहेलना करता है
देवर, ननद, आरी-पड़ोस बांझ तुझे सब कहता है
  
दिन दिन खटवाते काम कराते हो, न हो सब कुछ करवाते
पहले तो चूल्हा बरतन ही था अब गाय, भैंस, गोरू चरवाते
नहीं अन्त है, प्रारम्भ यह दुख भरे तेरे जीवन का
देखते हैं सब, जानते हैं आनन्द उठाते तुझ मज़॔बूरन का
  
फिर भी रे तू महाप्राण! जो इन सबको सह लेती है
पिसती-मरती, सब दुख सहती पर सुख संसार को देती है
ऐसे में क्या उचित है ऐसा कि तुझ को कहें हत्यारिन
नहीं, नहीं, नहीं रे, मॉ तू अब भी वही पुजारिन॥।

अनिल पाण्डेय