ख़ामोश हो क्यों दाद-ए-ज़फ़ा[1] क्यूँ नहीं देते
बिस्मिल[2] हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते
वहशत[3] का सबब रोज़न-ए-ज़िन्दाँ[4] तो नहीं है
मेहर-ओ-महो-ओ-अंजुम[5] को बुझा क्यूँ नहीं देते
इक ये भी तो अन्दाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ[6] है
ऐ चारागरो![7] दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
मुंसिफ़[8] हो अगर तुम तो कब इन्साफ़ करोगे
मुजरिम[9] हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
रहज़न[10] हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ[11] भी
रहबर हो तो मन्ज़िल का पता क्यूँ नहीं देते
क्या बीत गई अब के "फ़राज़" अहल-ए-चमन[12] पर
यारान-ए-क़फ़स[13] मुझको सदा[14] क्यूँ नहीं देते
Thursday, November 13, 2014
ख़ामोश हो क्यों दादे-ज़फ़ा क्यूँ नहीं देते / फ़राज़
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