नींद
सर्द [1]पलकों की सलीबों [2]से उतारे हुए ख़्वाब[3]
रेज़ा -रेज़ा[4]हैं मिरे सामने शीशों की तरह
जिन के टुकड़ों की चुभन,जिनके ख़राशों [5]की जलन
उम्र-भर जागते रहने की सज़ा देती है
शिद्दते-कर्ब[6]से दीवाना बना देती है
आज इस क़ुर्ब[7]के हंगाम[8]वो अहसास[9]कहाँ
दिल में वो दर्द न आँखों में चराग़ों का धुवाँ
और सलीबों से उतारे हुए ख़्वाबों की मिसाल[10]
जिस्म गिरती हुई दीवार की मानिंद[11]निढाल
तू मिरे पास सही ऐ मिरे आज़ुर्दा-जमाल[12]
Tuesday, November 11, 2014
नींद / फ़राज़
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