- ढूह की ओट बैठे
- बूढ़े से मैं ने कहा:
- मुझे मोती चाहिए।
- उस ने इशारा किया:
- पानी में कूदो।
- ढूह की ओट बैठे
मैं ने कहा : मोती मिलेगा ही, इस का भरोसा क्या?
- उस ने एक मूठ बालू उठा मेरी ओर कर दी।
- मैं ने कहा : इस में से मिलेगा मुझे मोती?
- उस ने एक मूठ बालू उठा मेरी ओर कर दी।
- उस ने एक कंकड़ उठाया और
- अनमने भाव से मुझे दे मारा।
- मैं ने बड़ा जतन दिखाते हुए उसे बीन लिया
- और कहा : यही क्या मोती है-
- आप का?
- धीरे-धीरे झुका माथा ऊँचा हुआ,
- मुड़ा वह मेरी ओर।
- सागर-सी उस की आँखें थीं
- उस ने एक कंकड़ उठाया और
सदियों की रेती पर इतिहास की हवाओं की लिखतों-सी
- नैन-कोरों की झुर्रियाँ।
- बोला वह :
- नैन-कोरों की झुर्रियाँ।
(कैसी एक खोयी हुई हवा उन बालुओं के ढूहों में से, घासों में से सर्पिल-सी फिसली चली गयी)
‘हाँ : या कि नहीं, क्यों?
- मिट्टी के भीतर पत्थर था
- पत्थर के भीतर पानी था
- मिट्टी के भीतर पत्थर था
पानी के भीतर मेंढक था
- मेंढक के भीतर अस्थियाँ थीं यानी मिट्टी-पत्थर था,
- लहू की धार थी यानी पानी था,
- श्वास था यानी हवा थी,
- जीव था यानी मेंढक था।
- मेंढक के भीतर अस्थियाँ थीं यानी मिट्टी-पत्थर था,
मोती जो चाहते हो
- उस की पहचान अगर यह नहीं
- तो और क्या है?’
- उस की पहचान अगर यह नहीं


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