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Wednesday, November 12, 2014

वापस-1 / अरुण कमल

जैसे रो-धो कर चुप हो हाथ-मुँह धो
अंतिम हिचकी भर
वापस चूल्हे के पास लौटती है नई वधू
भाई के जाने के बाद

वैसे ही लौटो तुम भी
बहुत हुआ बहुत रोए-गाए
अब साँझ हो रही है
बत्ती जलाओ और शुरू करो फिर वही पाठ
वहीं जहाँ छोड़ा था कल।

अरुण कमल

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