अब दोय घरी दिन शेष रह्यो पथ जात गुलाब सु ठीक नहीँ ।
नजदीक न ग्राम उजार महा मग लूटत लोग अथै दिन हीँ ।
इहि ठाँ बहु धाम सरै सब काम तमाम मिलै वर वस्तु सही ।
तुम जाहु न जाहु करौ जु रुचै सुदया धरि मैँ हित बात कही ।
रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
Wednesday, November 19, 2014
अब दोय घरी दिन शेष रह्यो पथ जात गुलाब सु ठीक नहीँ / अज्ञात कवि (रीतिकाल)
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