वो नीद की तरह नर्म सब्ज़ा
खवाबों की तरह रामिन्दा शबनम
फूलों की तरह शगुफ्ता चेहरे
खुशबू की तरह लतीफ़ बातें
किरनों की तरह जवाँ तबस्सुम
शोले की तरह दहकती काविशें
तारों की तरह चमकती आगोश
सागर की तरह छलकते सीने
सब काफिला ऐ अदम के राही
वादी ऐ अदम में चल रहे हैं
तारीकियों कॆ खिले हैं परचम
लम्हों के चराग जल रहे हैं
हर लम्हा हसीन और जवाँ है
हर लम्हा फरोग ऐ जिस्मों जाँ है
हर लम्हा अज़ीमो जावीदान् है
Thursday, November 20, 2014
लम्हों के चराग़ / अली सरदार जाफ़री
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