1.
बाधाओं से लड़ती है बराबर दुनिया
संघर्ष से छू लेती है अंबर दुनिया
तुम भूल के यह शाख़ न कटने देना
इस शाख़ पे आशा की है निर्भर दुनिया
2.
इंसान हूँ अमृत का प्याला मैं हूँ
धुन कोई भी हो, गूँजने वाला मैं हूँ
सूरज जो छुपा, बढ के अँधेरा लपका
दीपक ने कहा देख उजाला मैं हूँ
3.
ओस आँसू की तरह कब तक गिरेगी देखना
फूल बनकर हर कली हँसने लगेगी देखना
सब के दिल में तो छुपी बैठी नहीं है कालिमा
रोशनी पत्थर के दिल में भी मिलेगी देखना
Thursday, November 20, 2014
तीन मुक्तक / गिरिराज शरण अग्रवाल
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