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Sunday, November 16, 2014

ख़्वाब / फ़राज़


ख़्वाब[1]

वो चाँद जो मेरा हमसफ़र[2]था
दूरी के उजाड़ जंगलों में
अब मेरी नज़र से छुप चुका है

इक उम्र से मैं मलूलो-तन्हा[3]
ज़ुल्मात[4] की रहगुज़ार[5] में हूँ
मैं आगे बढ़ूँ कि लौट जाऊँ
क्या सोच के इन्तज़ार[6] में हूँ
कोई भी नहीं जो यह बताए
मैं कौन हूँ किस दयार[7] में हूँ
 

अहमद फ़राज़

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