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Thursday, November 20, 2014

बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है / इरफ़ान सिद्दीकी

बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है
उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है

चमक रहा है उफ़क़ तक ग़ुबारे-तीरा शबी
कोई चराग़ सफ़र पर रवाना हो गया है

हमें तो खैर बिखरना ही था कभी न कभी
हवा-ए-ताज़ा का झोंका बहाना हो गया है

फ़ज़ा-ए-शौक़ में उसकी बिसात ही क्या थी
परिन्द अपने परों का निशाना हो गया है

इसी ने देखे हैं पतझड़ में फूल खिलते हुए
दिल अपनी खुश नज़री में दिवाना हो गया है

इरफ़ान सिद्दीकी

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