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Wednesday, November 19, 2014

जंक्शन / आलोक धन्वा


आह जंक्श‍न !
रेलें जहाँ देर तक रुकती हैं
बाक़ी सफ़र के लिए पानी लेती हैं

मैं ढूँढता हूँ वहाँ
अपने पुराने हमसफ़र।

(1994)

आलोक धन्वा

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