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Friday, November 14, 2014

आखेट / आग्नेय

तुम
उस परिन्दे की तरह
कब तक डैने फड़फड़ाओगे
जिसकी गर्दन पर रखा हुआ है
चाहत का चाकू

उड़ान भरने से पहले ही
तुमने खो दिए हैं अपने पंख
प्यास बुझने के पहले ही
विष पी लिया
अमृत पान के लिए

तुम्हारे जैसा कौन मरता है
लालसाओं के जलसाघरों में
तिल-तिल, घुट-घुट कर
न तुम्हें प्रेम करना आया

बहती रही वह
तुम्हारी धमनियों में
रक्त की वर्णमाला की तरह
अलिखित अपरिभाषित
और न तुम्हें घृणा करना आया

जिसे तुम नकटी जदूगरनी
कहते ही उदास होकर रो देते हो

सारा जीवन किसके मायाजाल में
जकड़े रहे
कि अन्त में स्पाइडर की तरह
अपनी ही वासना की चरम परिणति में
आखेट कर लिए गए।

आग्नेय

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