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Friday, January 31, 2014

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे / ख़ालिद कर्रार

है मोल-भाव में बाज़ार मे है साथ मेरे
वो एक कार-ए-फ़ना-ज़ार में है साथ मेरे

सलीब-ए-जाँ से विसाल आसमाँ के साहिल तक
हर एक लज़्ज़त-आज़ार में है साथ मेरे

कभी तो हीरो बनाता है और कभी जोकर
हर एक रंग के किरदार में है साथ मेरे

यही बहुत है मेरे जिस्म ओ जाँ का हिस्सा है
कहीं तो मौज-ए-ख़ूँ-बार में साथ मेरे

अजब गुमान है जैसे के सरफ़राज हूँ मैं
अजीब फ़ित्ना-ए-दस्तार में है साथ मेरे

कभी मुझे भी ज़रा मोजज़ा-नुमा करता
जो अपनी ज़ात के असरार में हैं साथ मेरे

वो दस्तरस में है लेकिन नज़र से ग़ाएब है
हरीफ़-ए-जाँ कोई पैकार में है साथ मेरे

मैं इक निगाह को महसूस कर रहा हूँ मुदाम
कोई तो रेग-ए-फ़ना-ज़ार में है साथ मेरे

वो सारे ख़ेमे लगाता है फिर उखाड़ता है
सराब-ए-मंज़िल-ओ-आसार में है साथ मेरे

जो छोड़ देता है दश्त-ए-ज़वाल में तनहा
वा रेल-पेल में बाज़ार में है साथ मेरे

ख़ालिद कर्रार

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