Pages

Sunday, April 6, 2014

आसार-ए-रिहाई हैं ये दिल बोल रहा है / क़लक़

आसार-ए-रिहाई हैं ये दिल बोल रहा है
सय्याद सितम-गर मेरे पर खोल रहा है

जामे से हवा जाता है बाहर जो हर इक गुल
क्या बाग़ में वो बंद-ए-क़बा खोल रहा है

शाहों की तरह की है बसर दश्त-ए-जून में
दीवानों का हम-राह मेरे ग़ोल रहा है

तस्कीं को ये कहते रहे फ़ुर्क़त की शब अहबाब
लो सुब्ह हुई मुर्ग़-ए-सहर बोल रहा है

दिल तो दिया मीज़ाँ नहीं पटती नज़र आती
नज़रों में वो ख़ुश-चश्म मुझ तोल रहा है

अरशद अली ख़ान 'क़लक़'

0 comments :

Post a Comment