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Thursday, April 17, 2014

दिन एक सितम, एक सितम रात करे हो / कलीम आजिज़

दिन एक सितम, एक सितम रात करे हो
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी मात करो हो

हम खाक-नशीं, तुम सुखन-आरा-ए-सर-ए-बाम
पास आ के मिलो, दूर से क्या बात करो हो

हमको जो मिला है, वो तुम्ही से तो मिला है
हम, और, भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो!

दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करे हो, के करामात करो हो

बकने भी दो अज़ीज़ को, जो बोले है सो बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो

कलीम आजिज़

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