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Tuesday, April 15, 2014

चंद रुबाइयात / अमजद हैदराबादी

हर ज़र्रेपै फ़ज़ले-किब्रिया[1] होता है।
इक चश्मे-ज़दन में[2] क्या से क्या होता है॥
असनाम दबी ज़बाँ से यह कहते हैं--
"वो चाहे तो पत्थर भी खु़दा होता है॥

हर गाम पै चकरा के गिरा जाता हूँ।
नक़्शे-कफ़े-पा बनके मिटा जाता हूँ॥
तू भी तो सम्भाल मेरे देनेवाले!
मैं बारे-अमानत में दबा जाता हूँ॥

इस जिस्म की केचुली में इक नाग भी है।
आवाज़-शिकस्ता दिल में इक राग भी है॥
बेकार नहीं बना है, इक तिनका भी।
ख़ामोश दियासलाई में इक आग भी है॥


शब्दार्थ:
  1. ईश्वरीय कृपा
  2. पलक मारते
अमजद हैदराबादी

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