मेरे बाग़ीचे में
गुलाबों ,डेहलियों,पपियों
और ढेर सारे ख़ूबसूरत फूलों के बीच
एक कोने में मोगरे का पौधा
लड़ रहा है वर्षों से
मेरे बाग़ीचे में गंधों-सुगंधों से
अपनी देसी महक लिए
उसे खाद की, दवाई की ज़रूरत नहीं है
नहीं चाहता गुलदस्तों में सजना
रसिकों की कलाई में
और
नव-यौवनाओं के जूड़े से ही सन्तुष्ट है
अपना देसीपन लिए
मोगरा
Wednesday, April 9, 2014
मोगरा / कुँअर रवीन्द्र
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