कोई और तर्ज़े-सितम सोचिये।
दिल अब ख़ूगरे-इम्तहाँ[1] हो गया॥
कब हुई आपको तौफ़ीके़-करम[2]।
आह! जब ताक़ते फ़रियाद नहीं॥
करवटें लेती है फूलों में शराब।
हमसे इस फ़स्ल में तौबा होगी?
नहीं ऐ हमनफ़स! बेवजह मेरी गिरयासामानी।
नज़र अब वाकिफ़े-राज़े तबस्सुम होती जाती है॥
मेरी मज़लूम[3] चुप पर शादमानी[4] का गुमाँ क्यों हो?
कि नाउम्मीदियों के ज़ख़्म को बहना नहीं आता॥
तुझ से हयातो-मौत का मसअला हल अगर न हो।
ज़हरे-ग़मे-हयात पी मौत का इन्तज़ार कर॥
Wednesday, April 9, 2014
चंद शे’र / अली अख़्तर‘अख़्तर’
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