आँधियों में भी न चूके ज़ुल्म से लम्बे दरख़्त ।
जब गिरे तो, दूसरों को ले मरे लम्बे दरख़्त ।
दूब सब्ज़ा, तुन्द तूफ़ानों में भी, बेफ़िक्र था,
कुछ हवा सनकी तो काँपे खौफ़ से लम्बे दरख़्त ।
डूबने वाले का बन जाता है तिनका आसरा,
देखते रहते हैं साहिल पर खड़े लम्बे दरख़्त ।
आशियाने तो न जाने कब से जलते आए हैं,
आज तक ऐ बिजलियो कितने जले लम्बे दरख़्त ।
धूप उन मासूम सब्ज़ों की ये खाते हैं ’नदीम’
जिनमें पल-बढ़ कर हुए इतने बड़े लम्बे दरख़्त ।
Friday, April 4, 2014
आँधियों में भी न चूके ज़ुल्म से लम्बे दरख़्त / ओम प्रकाश नदीम
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