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Wednesday, March 26, 2014

जो तू शराब पिए क्यूँकि दिल कबाब न हो / इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

जो तू शराब पिए क्यूँकि दिल कबाब न हो
लगे जब आग कहाँ तक ये ज़हरा आब न हो

ख़ुनुक गुज़रते हैं अय्याम-ए-इश्क़ दाग़ बग़ैर
कि सर्द होवे हवा जिस दिन आफ़ताब न हो

दिवाने शहर से याँ आ के चैन पाते हैं
ख़ुदा करे ये ख़राबा कभी ख़राब न हो

इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

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