यूँ दिल है सर ब-सज्दा किसी के हुज़ूर में
जैसे की गोता-ज़न हो कोई बहर-ए-नूर में
हँस हँस के कह रही है चमन की कली कली
आता है लुत्फ़ हुस्न को अपने ज़ुहूर में
साक़ी निगाह-ए-मस्त से देता है जब कभी
लगते हैं चार-चाँद हमारे सुरूर में
खाएँ जनाब-ए-शैख़ फ़रेब-ए-क़यास-ओ-वहम
ये कैफ़-ए-जान-नवाज़ कहाँ चश्म-ए-हूर में
मिस्ल-ए-कलीम कौन सुने लन-तरानियाँ
मेरे लिए कशिश ही कहाँ कूह-ए-तूर में
बेश-अज़ दो हर्फ़ अपनी नहीं दास्ताँ-ए-दर्द
हम गिर के आसमान से अटके ख़ुजूर में
ये शोख़ियाँ कलाम में यूँही नहीं ‘अमीं’
पढ़ने चले हैं आप ग़ज़ल रामपुर में
Wednesday, October 15, 2014
यूँ दिल है सर ब-सज्दा किसी के हुज़ूर में / अमीन हज़ीं
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