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Monday, October 27, 2014

काजल / अविनाश मिश्र

तुम्हारी आँखों में बसा
वह रात की तरह था
दिन की कालिमा को सँभालता
उसने मुझे डूबने नहीं दिया
कई बार बचाया उसने मुझे
कई बार उसकी स्मृतियों ने

अविनाश मिश्र

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