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Monday, October 27, 2014

गोआ / कुमार अंबुज

चित्रों में कितना कम जिंदगी में फैला विस्तार अटूट
देश के नक्शे में चमकता हुआ एक किडनी की तरह
ललचाने वाली बदनामियों और प्रसिद्धि के बीच
अपनी लापरवाही में मस्त
हर कदम पर मिलते नारियल के वृक्ष मौज में हिलते-डुलते
ईसाइयत के निशान हजारों जिनमें पुर्तगाली चमक का एहसास बराबर
जहाँ भी बैठो मस्ती में या थक कर वहीं पास कहीं दिखता एक क्रॉस
समुद्र की नमक घुली हवा में साँस लेते हम जिसमें रसायनों की गंध कम
लेकिन खाना परोसता हुआ आदमी कहता है -
अब नहीं रही पहले-सी हवा !
मीलों फैले बीचों पर पर्यटकों का उत्सव अनंत
मौज-मस्ती के दृश्यों के बीच अविस्मरणीय वह कृशकाय अधेड़ जोड़ा
लहरों के साथ आई सीपियों को भूख से चलित हाथों से बीनता
मछलियों की गंध के बीच विदेशी ग्राहकों को पटाते आदमी निरक्षर बोलते अंग्रेजी
रेत के मुलायम गद्दे में धँसे हम अवाक् देखते डूबते सूर्य की अरुण छटा
जो फिर एक बार शब्दातीत
पास में ही गीली बालू पर समुद्री कीट के रेंगने के निशान
जिन्हें अगले पल में ही मिटाने आ रही वह एक तेज लहर
सुबह छह बजे की उजास में धुली सड़कें चमकती गलियाँ
रात आठ बजे से ही फिर अपनी चुप्पी के रहस्य में डूबती हुईं
लोग घरों में बंद चुपचाप लेते चुस्कियाँ
और वहीं प्रकृति में पकते काजुओं की खुशबू
ज़मीन में दफ़न हाँडी में से उठती है होरॉक की गंध
शाम होते ही हर घर धीरे-धीरे तब्दील होता किसी शराबखाने में
रोशनी की जरा-सी दरार में मिल जाती पीने की गुंजाइश
फिर समुद्र की तरफ से आने वाली हवाओं में झूमता शहर पणजी
घरों की गुल बत्तियों से पैदा हलके अँधेरे में
सोता हुआ चैतन्य नींद में
पुल के किनारे जलती बत्तियों की लंबी कतार की परछाइयाँ
गिर कर चमकती हैं खाड़ी के हरे-नीले जल में
उन्नीस सौ इकसठ की याद अभी धूमिल नहीं
घर-घर में एक बुजुर्ग जैसे उत्सर्ग और लंबी यातना का किस्सा
नेहरू की गोआ-नीति को ले कर नाखुश लोग शहीदों के लिए भावुक
बस्तियाँ नष्ट होती हैं इतना नव-निर्माण
हर तरफ से आती हैं सरिए काटने और फरमों में कंक्रीट डालने की आवाजें
भीतर गाँवों में हरीतिमा से घिरा वही विपन्न जीवन
हिप्पियों और नशेलचियों के लिए एक मुफीद जगह
पर्यटन केंद्रों में श्रेष्ठता की होड़ ने सस्ती कर दी है शराब
एक पर्यटक की तरह भी देखते हुए कितना कम
लौटते हैं हम जुड़वाँ पुलों में से एक को पार करते हुए
जहाँ से रोशन जहाज की तरह चमकता हुआ
दिखता है विधान-सभा का श्वेत-भवन !

कुमार अंबुज

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