सियाही ढल के पलकों पर भी आए
कोई लम्हा धनक बन कर भी आए
गुलाबी सीढ़ियाँ से चाँद उतरे
खिराम-ए-नाज़ का मंजर भी आए
लहू रिश्तों का अब जमने लगा है
कोई सैलाब मेरे घर भी आए
मैं अपनी फिक्र का कोह-ए-निदा हूँ
कोई हातिम मेरे अंदर भी आए
मैं अपने आप का कातिल हूँ ‘अजमल’
मेरा आसेब अब बाहर भी आए
Wednesday, April 9, 2014
सियाही ढल के पलकों पर भी आए / कबीर अजमल
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)


0 comments :
Post a Comment