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Thursday, March 20, 2014

बस तेरे लिए उदास आँखें / ग़ालिब अयाज़

बस तेरे लिए उदास आँखें
उफ़ मस्लहत ना-शनास आँखें

बे-नूर हुई हैं धीरे धीरे
आईं नहीं मुझ को रास आँखें

आख़िर को गया वो काश रूकता
करती रहीं इल्तिमास आँखें

ख़्वाबीदा हक़ीक़तों की मारी
पामाल और बद-हवास आँखें

दरपेश जुनूँ का मरहला और
फ़ाक़ा है बदन तो प्यास आँखें

ग़ालिब अयाज़

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