ज़मीं है हमारी न ये आसमाँ है
जहाँ में हमारा बसेरा कहाँ है
ये कैसा मकाँ है हमारे सफ़र का
कोई रास्ता है न कोई निशाँ है
अभी हर तरफ़ है तसादुम की सूरत
सुकूँ ज़िन्दगी का यहाँ न वहाँ है
कभी हँसते-हँसते छलक आए आँसू
निगाहों के आगे धुआँ ही धुआँ है
शराफ़त को उजड़े मकानों में ढूँढ़ो
शहरों में इसका ठिकाना कहाँ है
चलो फिर करेंगे उसूलों की बातें
अभी तो हमें इतनी फ़ुरसत कहाँ है
Thursday, March 20, 2014
ज़मीं है हमारी न ये आसमाँ है / अज़ीज़ आज़ाद
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