आशिक की सआदत है जो सर उसका झुका है
क़ातिल तेरी तलवार नहीं, बाल-ए-हुमा है
जब वादी-ए-वहशत में गुज़र मेरा हुआ है
हर एक बगोला पए ताज़ीम उठा है
दावाए खुदाई जो बुतों हैं न फिरो दूर
सोचो के रग-ए-जां से भी नज़दीक खुदा है
लैला के तसव्वुर में ये मशगूल है मजनूं
जो नाल-ए-ज़ंजीर है एक बांग-ए-दरा है
तुझ बिन ये अंधेरा है मेरी आँखों के आगे
कहता हूँ शब-ओ-रोज को मैं जुल्फ़-ए-दोता है
ख़ालिक ने ये सुर्ख़ उसके कफ़-ए-पा को बनाया
होता है ज़माने को यक़ीं रंग-ए-हिना है
आलम नज़र आता है तेरे इश्क़ में बीमार
इश्क़ उसका न कहिए ये ज़माने में बवा है
कहिए जो तवील उसको सज़ावार है ‘नासिख़’
जिस बहर में उस जुल्फ़ का मज़मून बंध है
Monday, March 17, 2014
आशिक की सआदत है जो सर उसका झुका है / इमाम बख़्श 'नासिख'
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