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Thursday, March 20, 2014

जिस्म दरिया का थरथराया है / इरशाद खान सिकंदर

जिस्म दरिया का थरथराया है
हमने पानी से सर उठाया है

शाम की सांवली हथेली पर
इक दिया भी तो मुस्कुराया है

अब मैं ज़ख़्मों को फूल कहता हूँ
फ़न ये मुश्किल से हाथ आया है

जिन दिनों आपसे तवक़्को थी
आपने भी मज़ाक़ उड़ाया है

हाले दिल उसको क्या सुनाएँ हम
सब उसी का किया-कराया है

इरशाद ख़ान सिकन्दर

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