कान्ह की बाँकी चितौनि चुभी झुकि ,
काल्हि झाँकी है ग्वालि गवाछनि ।
देखी है नोखी सी चोखी सी कोरिन ,
ओछे फिरै उभरे चित जाछनि।
मारेइ जाति निहारै मुबारक यै ,
सहजै कजरारे मृगाछनि ।
सीँक लै काजर दे री गँवारिनि ,
आँगुरी तेरी कटैगी कटाछनि ।
रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
Monday, March 17, 2014
कान्ह की बाँकी चितौनि चुभी झुकि / अज्ञात कवि (रीतिकाल)
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