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Wednesday, March 19, 2014

बहरापन-5 / ऋषभ देव शर्मा

धूल, धुआँ, गुब्बार,
तेज़ाब ही तेज़ाब,
रेडियोधर्मी विकिरण -
तपता हुआ
ब्रह्माण्ड का गोला;
फटने लगे हैं
अंतरिक्ष के कानों के परदे,
चीख़ती है निर्वसना प्रकृति
......और......
           दिशाएँ बहरी हैं !

ऋषभ देव शर्मा

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