ऑसवित्ज़ के बाद
कविता सम्भव नहीं रह गयी थी ।
इसे सम्भव बनाना पड़ा था ।
शान्ति की दुहाई ने नहीं,
रहम की गुहारों ने नहीं
दुआओं ने नहीं, प्रार्थनाओं ने नहीं,
कविता को सम्भव बनाया था
न्याय और मानवता के पक्ष में खड़े होकर
लड़ने वाले करोड़ों ने अपनी क़ुर्बानियों से ।
लौह-मुष्टि ने ही चूर किया था वह कपाल
जहाँ बनती थी मानवद्रोही योजनाएँ
और पलते थे नरसंहारक रक्त-पिपासु सपने ।
गुजरात के बाद कविता सम्भव नहीं ।
उसे सम्भव बनाना होगा ।
कविता को सम्भव बनाने की यह कार्रवाई
होगी कविता के प्रदेश के बाहर ।
हत्यारों की अभ्यर्थना में झुके रहने से
बचने के लिए देश से बाहर
देश-देश भटकने या कहीं किसी ग़ैर देश की
सीमा पर आत्महत्या करने को विवश होने से
बेहतर है अपनी जनता के साथ होना
और उन्हें याद करना जिन्होंने
जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि जान देने के लिए
कूच किया था अपने-अपने देशों से
सुदूर स्पेन की ओर ।
कविता को यदि सम्भव बनाना है 2002 में
गुजरात के बाद
और अफ़गानिस्तान के बाद
और फ़िलिस्तीन के बाद,
तो कविता के प्रदेश से बाहर
बहुत कुछ करना है ।
चलोगे कवि-मित्रो,
इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना ?
(रचनाकाल : अप्रैल 2002)
Tuesday, March 18, 2014
गुजरात - 2002 - (दो) / कात्यायनी
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