जब हमें मस्जिद में जाना पड़ा है
राह में इक मै-ख़ाना पड़ा है
जाइए अब क्यूँ जानिब-ए-सहरा
शहर तो ख़ुद वीराना पड़ा है
हम न पिएँगे भीक की साकी
ले ये तेरा पैमाना पड़ा है
हरज न हो तो देखते चलिए
राह में इक दीवाना पड़ा है
खत्म हुई सब रात की महफिल
एक पर-ए-परवाना पड़ा है
Sunday, October 5, 2014
जब हमें मस्जिद में जाना पड़ा है / 'कैफ़' भोपाली
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