वासन्ती रूप की तरह
केसरिया धूप की तरह
प्रीत-गन्ध फैली।
ऋतुओं ने तोड़ दिए
वक़्त के कगार
मोती-सा दमक उठा
मटमैला प्यार।
स्वप्नमयी हूर की तरह
तन के मयूर की तरह
नाच उठी चेतना रुपहली
प्रीत-गन्ध फैली।
आँगन भर अनुभव ने
मोहबेल छोड़ी
जगवंती हो गई
आस्था निगोड़ी।
अपराजित राग की तरह
फागुनी अनुराग की तरह
गूँज उठी एक स्वर-शैली
प्रीत-गन्ध फैली।
Tuesday, October 7, 2014
प्रीत-गंध / अश्वघोष
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