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Thursday, October 9, 2014

यही कहा था मेरे हाथ में है आईना / फ़राज़


यही कहा था मेरे हाथ में है आईना[1]
तो मुझपे टूट पड़ा सारा शहर नाबीना[2]

मेरे चिराग़ तो सूरज के हम-नसब[3] निकले
ग़लत था अब के तेरी आँधियों का तख़्मीना[4]

ये ज़ख्म खाईयो सर पर ब-पासे-दस्ते-सुबूब[5]
वो संगे-मोहतसिब[6] आया, बचाईयो मीना

हमें भी हिज्र[7] का दुख है ना क़ुर्ब[8] की ख़्वाहिश[9]
सुनो कि भूल चुके हम भी अहदे-पारीना[10]

उस एक शख़्स की सज-धज ग़ज़ब की थी ऐ `फ़राज'
मैं देखता था उसे, देखता था आईना


अहमद फ़राज़

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