पहले बस ये था कि दिल में कुछ नज़र में और कुछ ।
अब इज़ाफ़ा[1] हो गया है इस हुनर में और कुछ ।
मौज[2] में फँसकर बदल देता है पानी भी मिज़ाज,
साहिलों पर और तेवर हैं, भँवर में और कुछ ।
मुझको डर है बढ़ न जाए और बीमारी मेरी,
मैनें देखा है निगाह-ए-चारागर में और कुछ ।
कुछ सहाफ़त[3] का मज़ा भी तो ज़माने को चखा,
चटपटी कर दे मिला दे इस ख़बर में और कुछ ।
जल्द लौटूँ आप की ये ज़िद ही काफ़ी है ’नदीम’,
क्या करूँगा रख के सामान-ए-सफ़र में और कुछ ।
Wednesday, October 8, 2014
पहले बस ये था कि दिल में कुछ नज़र में और कुछ / ओम प्रकाश नदीम
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