जब उस ज़ुल्फ़ की बात चली ढलते ढलते रात ढली उन आंखों ने लूट के भी अपने ऊपर बात न ली शम्अ का अन्जाम न पूछ परवानों के साथ जली अब भी वो दूर रहे अब के भी बरसात चली 'ख़ातिर' ये है बाज़ी-ए-दिल इसमें जीत से मात भली
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