ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है
तेरा मिलना भी मुझ को खल रहा है
जिसे मैं ने किया था बे-ख़ुदी में
जबीं पर अब वो सजदा जल रहा है
मुझे मत दो मुबारक-बाद-ए-हस्ती
किसी का है ये साया चल रहा है
सर-ए-सहरा सदा दिल के शजर से
बरसता दूर इक बादल रहा है
फ़साद-ए-लग़्ज़िश-ए-तख़लीक़-ए-आदम
अभी तक हाथ यज़दाँ मल रहा है
दिलों की आग क्या काफ़ी नहीं है
जहन्नम बे-ज़रूरत जल रहा है
Wednesday, October 8, 2014
ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है / आसिफ़ 'रज़ा'
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)


0 comments :
Post a Comment