पृथ्वी की उत्पत्ति भले ही अभी भी एक रहस्य हो
किन्तु ऊसर की उत्पत्ति के बारे में कुछ भी रहस्यमय नहीं
धरती पर रेगिस्तान भले ही बनते हों जलवायु-परिवर्तनों से
लेकिन ऊसर जमीन तो पैदा होती है
उर्वर व सिंचित प्रदेशों में ही।
गहरा नाता होता है ऊसर भूमि का
अतीत में किए गए उसकी उर्वरता के दोहन से
गनीमत यही है कि
स्थायी नहीं होती धरती की यह अक्षमता
उपचारित किए जाने पर कभी भी बन सकती है
कोई भी ऊसर भूमि उपजाऊ।
Tuesday, November 25, 2014
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 5 / उमेश चौहान
Saturday, February 22, 2014
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 3 / उमेश चौहान
एक हरा-भरा उपजाऊ खेत
आज ऊसर में तब्दील हो गया है,
जरूर सींचा होगा इसे साल दर साल
किसी गरीब मजदूर ने
खाली पेट अपने पसीने से
और इत्र से नहाया होगा रोज़ इसका निठल्ला जमींदार,
जरूर रेशमी चादर बिछाकर सोई होगी बरसों घर की मालकिन
रोज़ शाम उस मजदूर की बीबी से
अपने बेकारी से थके नितंबों को दबवाती हुई,
जरूर लगी होगी इस खेत को उनकी हाय
जो बरसों से इसे जोतते, बोते, सींचते, गोड़ते और काटते हुए भी
अपने किसान होने का दावा भी नहीं कर सकते
गल्ले के किसी सरकारी खरीद-केन्द्र पर।
अब और कोई चारा नहीं
अगर बनाना है इस ऊसर खेत को फिर से उपजाऊ
तो सौंप देना होगा इसे छीनकर उन निकम्मे लोगों से
सर्जना को आतुर मेहकतकश हाथों में
वे जरूर बना देंगे इसे फिर से उपजाऊ
भले ही उन्हें सींचना पड़े इसे अपने खून से भी।
Tuesday, January 28, 2014
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 8 / उमेश चौहान
मस्तिष्क में पैदा हुआ ऊसरपन भी
दूर किया जा सकता है
थोड़े से तेजाबी विचारों का घोल
धीरे-धीरे पेवश्त कर
जड़ता की अभेद्य परत में छिपी
सिकुड़ी-सूखी शिराओं में
जैसे पहाड़ी शिला से छिटका हुआ कोई पत्थर
नदी के तीव्र प्रवाह में
धीरे-धीरे घिसता हुआ
एक दिन बन जाता है
पूजा-गृह में रखा जाने वाला सुघड़ शिवलिंग।
Sunday, January 12, 2014
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 7 / उमेश चौहान
समय का खारापन सिमट आने पर
मन का खेत भी हो जाता है ऊसर
और फिर नहीं लहलहाती उसमें
विचारों की कोई भी पोषक फसल।
Thursday, November 21, 2013
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 4 / उमेश चौहान
फसल लहलहाने की आशा नहीं की जा सकती
यदि मिट्टी के सीने पर नमक की जकड़न हो
ऊपर से चाहे जितनी तरलता दी जाय उसे
और चाहे उसमें डाली जाय
कितने भी पोषक तत्वों से भरी खाद
सब कुछ व्यर्थ ही हो जाएगा
तुलसी बाबा कह ही गए हैं
'ऊसर बीज बये फल जथा'।
उपाय तो एक ही है बस कि
चीरा जाय धरती का सीना
गलाया जाय बरसों का जमा नमक
और बहाकर दूर ले जाया जाय उसे नालियों के सहारे
जैसे गुरदे बहा देते हैं खींचकर
शरीर का सारा अपशिष्ट मूत्र की शक्ल में।
जरूरी है अब कि मुक्त किया जाय मिट्टी को
इस खारेपन की त्रासदी से
ताकि उम्मीद की जा सके कि
धरती पर फिर से लहलहा सकती है
हमारे मनचाहे सपनों की फसल।
Monday, October 28, 2013
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 9 / उमेश चौहान
कण-कण शोषित
प्रतिबन्धित और उपेक्षित
परित्यक्त, निराश, निरर्थक
हूँ पड़ी गले तक भरे आर्द्रता
होठों पर पपड़ी मोटी
उद्यत हूँ कोख सजाने को
सूखापन दूर भगाने को
अँगड़ाई लेने को आतुर
हैं रुँधी नसें सब मेरी
समझो अब मेरी पीड़ा
अब फाड़ो मेरी छाती
ठंडा जो रक्त जमा है
उसको पिघलाकर पी लो
कुछ गर्म लहू टपकाओ!
बरसों से भीतर सुप्त पड़ी
उर्वरता पुनः जगाओ!
आओ! अब बो दो अपने सपने
मेरे सपाट सीने में
सुस्थिर भविष्य का अपना
उपवन अब यहीं सजा दो!
ऊसरपन मेरा छीन पुनः
उपजाऊ मुझे बना दो!
Tuesday, October 22, 2013
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 2 / उमेश चौहान
आज जो जमीन पड़ी है ऊसर
कल तक यही उपजाऊ थी
अतीत की कुछ गलतियाँ -
सब कुछ चुपचाप सह लेने की आदत
उर्वरता का बेहिसाब दोहन
क्षमता का मनमाना शोषण -
जिनके चलते इसके सीने पर जमता चला गया
वाष्पित आँसुओं का ढेर सारा खारापन।
लवणों की कठोर दीवार के नीचे
अभी भी बची है मिट्टी की नैसर्गिक उर्वरता
अभी भी किसी तेजाब से गलाई जा सकती है
यह अभेद्य क्षारीय दीवार
अभी भी यह ऊसर जमीन बन सकती है उपजाऊ।

