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Wednesday, December 31, 2014

पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो / केशव.

पायन को परिबो अपमान अनेक सोँ केशव मान मनैबो ।
सीठी तमूर खवाइबो खैबो विशेष चहूँ दिशि चौँकि चितैबो ।
चीर कुचीलन ऊपर पौढ़िबो पातहु के खरके भगि ऎबो ।
आँखिन मूँद के सीखत राधिका कुँजन ते प्रति कुँजन जैबो ।


केशव.का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

केशव (रीतिकालीन कवि)

Saturday, November 15, 2014

अर्थशाला / भूमिका / केशव कल्पान्त

एडम स्मिथ ने ही अर्थशास्त्र को,
‘धन’ का नव विज्ञान बताया।
मानव के भौतिक जीवन में,
‘धन’ को ही ‘साध्य’ बताया।

केशव कल्पान्त

Tuesday, March 25, 2014

अर्थशाला / भूमिका / केशव कल्पान्त

उचित नहीं उद्देश्य एक बस,
मानव की कल्याण साधना।
द्रव्य तराजू लिए हाथ में,
मानव का कल्याण आँकना।

केशव कल्पान्त

Thursday, March 13, 2014

सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै / केशव.

सोने की एक लता तुलसी बन क्योँ बरनोँ सुनि बुद्धि सकै छ्वै ।
केशव दास मनोज मनोहर ताहि फले फल श्री फल से द्वै ।
फूलि सरोज रह्यो तिन ऊपर रूप निरूपन चित्त चले चवै ।
तापर एक सुवा शुभ तापर खेलत बालक खंञन के द्वै ।


केशव का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

केशव (रीतिकालीन कवि)

Tuesday, February 25, 2014

अर्थशाला / भूमिका / केशव कल्पान्त

इच्छाएँ अनन्त है साथी,
लेकिन साधन तो हैं सीमित।
साधन की तुलना में रहती,
है आवश्यकताएँ असीमित।

जीवन क्रम में कदम-कदम पर,
‘निर्णय’ के अवसर आते हैं।
‘मापदण्ड रौबिन्स’ इसी से,
अर्थ क्रिया का पफल पाते हैं।

केशव कल्पान्त

Friday, February 14, 2014

कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक पर / केशव.

कैधौँ कली बेला की चमेली सी चमक परै ,
कैधौं कीर कमल मे दाड़िम दुराए हैँ ।
कैधौँ मुकताहल महावर मे राखे रँगि ,
कैधौं मणि मुकुर मे सीकर सुहाए हैँ ।
कैधौं सातौँ मंडल के मंडल मयंक मध्य ,
बीजुरी के बीज सुधा सींचि कै उराए हैँ ।
केसौदास प्यारी के बदन में रदन छवि ,
सोरहो कला को काटि बत्तिस बनाए हैँ ।


केशव का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

केशव (रीतिकालीन कवि)

Saturday, January 25, 2014

नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै / केशव.

नैनन के तारन मै राखौ प्यारे पूतरी कै,
मुरली ज्योँ लाय राखौं दसन बसन मैं।
राखौ भुज बीच बनमाली बनमाला करि,
चंदन ज्योँ चतुर चढ़ाय राखौं तन मैँ।
केसोराय कल कंठ राखौ बलि कठुला कै,
भरमि भरमि क्यों हूँ आनी है भवन मैँ।
चंपक कली सी बाल सूँघि सूँघि देवता सी,
लेहु प्यारे लाल इन्हेँ मेलि राखौं तन मैँ।


केशव का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

केशव (रीतिकालीन कवि)

Thursday, January 23, 2014

अर्थशाला / भाग 1 / केशव कल्पान्त

विषय ज्ञान से पहले उसकी,
परिभाषा को जान जाइए।
विषय-वस्तु की सामग्री को,
परिभाषा ही मान जाइए ॥1॥

अर्थशास्त्र की परिभाषा पर,
मत अनेक सम्मुख आए हैं।
अर्थशास्त्री मिले पाँच जब,
छह-छह मत प्रस्तुत पाए हैं ॥2॥

सीमाओं में बँधी हुई हैं,
अर्थशास्त्र की परिभाषाएँ।
जैसे जीवन को घेरे हैं,
प्रतिपल नूतन अभिलाषाएँ ॥3॥

पुराकाल में अर्थशास्त्र को,
राज्य व्यवस्था से जोड़ा था।
यूनानी विद्वानों ने तो,
गृह शिल्पोन्मुख कर जोड़ा था ॥4॥

सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने ही,
अति वैज्ञानिक रूप दिखाया।
इसलिये उनको ही सबने,
अर्थशास्त्र का ‘जनक’ बताया ॥5॥

‘राष्ट्रों के धन’ पुस्तक ने फिर,
विश्व चेतना जाग्रत कर दी।
अर्थशास्त्र के विद्वानों में
नवयुगीन प्रेरणा भर दी ॥6॥

एडम स्मिथ ने ही अर्थशास्त्र को,
‘धन’ का नवविज्ञान बताया।
मानव के भौतिक जीवन में,
‘धन’ को ही था साध्य बताया ॥7॥

निजी स्वार्थ से प्रेरित होकर,
मानव काम किया करता है।
इच्छाओं की पूर्ति हेतु धन,
संग्रह नित्य किया करता है ॥8॥

‘स्मिथ’ ने ही इस मानव को,
‘आर्थिक मानव’ नाम दिया है।
स्व-हित स्वार्थ साधनों पर ही,
जीवन का विश्वास किया है ॥9॥

जीवन-क्रम में कैसे-कैसे,
धन अर्जन करता है मानव।
यही शास्त्र की परिभाषा है,
कहता अर्थशास्त्रविद् मानव ॥10॥

‘जे०बी० से’ ने खुले रूप में,
‘स्मिथ’ को ही था दुहराया।
‘वाकर’ ने भी अर्थशास्त्र को,
‘धन’ का ही विज्ञान बताया ॥11॥

‘स्मिथ’ और अनुयायियों को ही,
‘प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री’ कहा जाता है।
विद्वानों की शृंखला में इनको,
संस्थापक माना जाता है ॥12॥

केशव कल्पान्त

Friday, January 10, 2014

अर्थशाला / भाग 2 / केशव कल्पान्त

Ruskin and Carlyle too have,
Denounced Smith with all the might.
Is the wave of 'bread and butter',
The only life-current of the wight.

The meaningful science is not,
That teaches the love of Mammon.
The evolution of the material,
Is not the gay life's my canon.

William Maurice and Burke,
Did call it unpraiseworthy.
Is wealth alone in human life,
The only help sturdy.

It was gradually that the new,
Form of Economics came round.
And the best among the learned,
Was Marshall later found.

Marshall then freed Economics,
From all limitations and bounds.
And placed it on a solid footing,
With a new scientific background.

Marshall has studied man,
In the common life's career.
He concentrates less upon wealth,
Than the materialistic welfare.

In personal and social ways,
Are judged all the acts.
In view of getting worldly bliss,
Are considered all the facts.

Economics, on one side, is,
Surely the study of wealth.
But more it concentrates upon,
The human weal or health.

Social beings do alone,
Fall within the subject.
Robinson Crusoe and the sages,
Are such as we must neglect.

The difference of Economic and uneconomic,
Was on activities based.
The scope of the subject was,
With economic activities graced.

It was Marshall who declared,
It as Art as well as Science.
It was he who called it,
The ideal and Welfare Science.

Those falling in line with Marshall,
Are Canon, Pigou and Beveridge.
They show us an improved form,
Of the economic activities.

To Pigou the aim of this science,
Was really Social Welfare.
He pointed its relation with wealth,
Was directly or indirectly fair.

केशव कल्पान्त

Sunday, January 5, 2014

अर्थशाला / भाग 4 / केशव कल्पान्त

अनन्त-इच्छा, सीमित-साधन पर,
मानव नित चिन्तन करता है।
क्षितिज बिन्दु बस यही जहाँ से,
अर्थशास्त्र मन्थन करता है ॥36॥

जीवन-क्रम में कदम-कदम पर,
‘निर्णय’ के अवसर आते हैं।
‘मापदण्ड रोबिन्स’ इसी से,
अर्थ-क्रिया का पफल पाते हैं ॥37॥

श्री रोबिन्स महोदय की ही,
परिभाषा ने भेद मिटाये।
अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि पर,
मानवता के रूप दिखाये ॥38॥

अर्थशास्त्र के घेरे में तो,
वस्तु सत्य का ही अध्ययन है।
झूठ काल्पनिक लक्ष्य यही तो,
अर्थशास्त्र का उल्लंघन है ॥39॥

निगमन-विधि की ही सुरीति से,
नियम आर्थिक नित जँचते हैं।
सार्वभौम प्रयोगों से ही,
व्यापकता धारणा करते हैं ॥40॥

‘वूटन’ ‘बेवरिज’ व ‘प्रफेजर’ ने,
रोबिन्स पर आरोप लगाये।
कटु आलोचनात्मक ढंग से,
परिभाषा में दोष गिनाये ॥41॥

लक्ष्य और साधना का अन्तर,
कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया।
एक दूसरे पर आश्रित हैं,
पृथक नहीं इनकी दो काया ॥42॥

सृजन हेतु आर्थिक नियमों के,
सक्षम नहीं निगमन-प्रणाली।
अर्थशास्त्र की वैज्ञानिकता पर,
सत्य यही आगमन-प्रणाली ॥43॥

रोबिन्स जी के इस विचार ने,
अर्थशास्त्र का क्षेत्र बढ़ाया।
व्यावहारिकता के विचार से,
इसका अति अस्तित्व घटाया ॥44॥

रोबिन्स की ही परिभाषा में,
नूतन परिवर्तन दिखलाया।
भारतीय सांस्कृतिक तथ्य को,
मेहता ने आधर बनाया ॥45॥

सादा जीवनोच्च विचार का,
कुछ मौलिक आदर्श बनाया।
इच्छाओं का परित्याग ही,
अर्थशास्त्र-उत्कर्ष बताया ॥46॥

चेतन और अचेतन इच्छा,
मानव को पीड़ित करती है।
उत्पीड़ित मन की अनुभूति,
जीवन का हर सुख हरती है ॥47॥

इच्छा के ही जनित कष्ट से,
मानव दुःख भोगा करता है।
सरल, सुखद, निस्पृहता तज कर,
दिग्भ्रम में भटका करता है ॥48॥

चिर-सुख चिर-आनन्द हेतु ही,
इच्छाओं का दमन करो तुम।
संतोषी ही परम सुखी है,
जीवन का अवलम्ब धरो तुम ॥49॥

बाहर के आकर्षण से तुम,
अपने मन को दूर हटा लो।
शिक्षा से मन को धेकर तुम,
परमपूर्ण आनन्द उठा लो ॥50॥

केशव कल्पान्त

Sunday, November 24, 2013

अर्थशाला / भूमिका / केशव कल्पान्त

सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने ही,
अति वैज्ञानिक रूप दिखाया।
इसलिये उनको ही सबने
अर्थशास्त्र का ‘जनक’ बताया।

केशव कल्पान्त

Monday, November 11, 2013

अर्थशाला / भाग 3 / केशव कल्पान्त

मार्शल की परिभाषा को भी
दोष-मुक्त हम कह न सकेंगे।
इस युग की परिभाषाओं में
सर्वश्रेष्ठ हम कह न सकेंगे ॥26॥

कहता है रोबिन्स कि मार्शल
की परिभाषा सत्य नहीं है।
‘भौतिक’ और ‘अभौतिकता’ का
अंतर ही स्पष्ट नहीं है ॥27॥

क्या यथार्थ जीवन के अन्दर,
‘साधरण व्यवहार’ झलकता।
मार्शल की परिभाषा में यह,
शब्द निरर्थक-सा है लगता ॥28॥

भौतिक सुख की सीमाओं में,
अर्थशास्त्र क्या बँध सकता है।
भौतिकता से दूर क्रियाओं,
से भी तो जीवन सधता है ॥29॥

उचित नहीं उद्देश्य एक बस,
मानव की कल्याण साधना।
द्रव्य तराजू लिए हाथ में,
मानव का कल्याण आँकना ॥30॥

नूतन रंग तूलिका से था,
अर्थशास्त्र का रूप सँवारा।
लन्दन का विख्यात विचारक,
था ‘रोबिन्स’ सभी का प्यारा ॥31॥

अर्थशास्त्र का महल खड़ा है,
चार मूल तत्वों के ऊपर।
जीवन का अस्तित्व टिका है,
कुछ यथार्थ सत्यों के ऊपर ॥32॥

मानव की गठरी के अन्दर,
इच्छाओं का बोझ बँधा है।
एक चाह पूरी होते ही,
नव इच्छा का रूप सजा है ॥33॥

इच्छाएँ अनन्त हैं, साथी !
लेकिन साधन तो हैं सीमित।
साधन की तुलना में रहती,
हैं आवश्यकताएँ असीमित ॥34॥

सीमित साधन का प्रयोग तो,
वैकल्पिक रूपों में होता।
इच्छा का अपना स्वरूप नित,
नए-नए सपनों में होता ॥35॥

केशव कल्पान्त