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Sunday, November 30, 2014

चंदा मामा / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।

मैं तैरा मृग-छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल-कूद देखूँगा,
उसको चाटूँगा-चूमूँगा।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Tuesday, November 18, 2014

एक तिनका / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।1।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।2।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।
तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिये।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।3।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Saturday, November 8, 2014

हुआ सवेरा / कन्हैयालाल मत्त

हुआ सवेरा, गया अँधेरा,
सूरज रहा निकल
हाँ भई फक्कड़, लाल बुझक्कड़,
तू भी ढंग बदल ।

बुरे काम तज, राम राम भज,
मत रट मरा-मरा
अपने-अपने, देख न सपने,
मन रख हरा-भरा ।

अगर-मगर में, उलझ डगर में,
क्यों तू अड़ा-खड़ा
मस्त उछलता, रह तू चलता,
नाम कमा तगड़ा ।

है बेमानी, सनक पुरानी,
उसको दूर भगा
नई कहानी, सुना जबानी,
पिछले गीत न गा ।

कन्हैयालाल मत्त

Thursday, November 6, 2014

चन्दा मामा दूर के / अश्वघोष

चन्दा मामा दूर के
छिप-छिप कर खाते हैं हमसे
लड्डू मोती चूर के

लम्बी-मोटी मूँछें ऐंठे
सोने की कुर्सी पर बैठे
धूल-धूसरित लगते उनको
हम बच्चे मज़दूर के
चन्दा मामा दूर के।

बातें करते लम्बी-चौड़ी
कभी न देते फूटी कौड़ी
डाँट पिलाते रहते अक्सर
हमको बिना कसूर के
चन्दा मामा दूर के।

मोटा पेट सेठ का बाना
खा जाते हम सबका खाना
फुटपाथों पर हमें सुलाकर
तकते रहते घूर के
चन्दा मामा दूर के।

अश्वघोष

Tuesday, October 14, 2014

डंडा-डोली पालकी / कन्हैयालाल मत्त

डंडा डोली पालकी
जय कन्हैया लाल की!

आगे-बागे टूल के,
झांझ-मंजीरे कूल के
शंख समंदर-कूल के
ढपली धुर बंगाल की!
जय कन्हैया लाल की

कमर करधनी कांस की
वंशी सूखे बांस की
जिसमें जगह न सांस की,
झांकी बड़े कमाल की
जय कन्हैयालाल की

माखन-मिस्री घोलकर
मन-भर पक्का तोलकर
खाते हैं दिल खोलकर
रबड़ी पूरे थाल की
जय कन्हैयालाल की

कन्हैयालाल मत्त

Friday, March 21, 2014

माँ सरस्वती / गिरीश पंकज

जय, जय, जय हे माँ सरस्वती,
तुमको आज निहार रहा हूँ ।
अपने हाथ पसार रहा हूँ ।।

ज्ञान-शून्य हो भटक रहा हूँ,
मुझको नव-पथ तू दर्शा दे ।
सूखे मानस में तू मेरे,
ज्ञान-सुधा आकर बरसा दे ।
मुझको शक्ति दे दे माता,
पल-पल में मैं हार रहा हूँ ।।

मातृभूमि की सेवा ही अब,
जीवन का आधार बने माँ ।
कर्म हमारी पूजा होगी,
स्वार्थ नहीं दीवार बने माँ ।
दे आशीष मुझे ओ शारद,
कबसे तुम्हें पुकार रहा हूँ ।।

कर कमलों में वीणा शोभित,
सत्कर्मों के गीत सुनाते ।
श्वेत-वसन पावन माँ तेरे,
विमल आचरण को दर्शाते ।
ज्ञान किरण दे, घोर तिमिर में,
घिरता मैं हर बार रहा हूँ ।

जय, जय, जय हे माँ सरस्वती,
तुमको आज निहार रहा हूँ ।

गिरीश पंकज

Saturday, February 22, 2014

किरन परी / कृष्ण शलभ

चम-चम, चम-चम, चाँदी जैसे
पंख खोल इक किरन परी
रात मुझे सपने में जाने
कहाँ-कहाँ ले उड़ी फिरी

चटपट आसमान तक जा कर
झट नीचे आ जाती थी
जहाँ घूमती वहाँ-वहाँ का
सारा हाल बताती थी
नदियाँ, नाले, पर्वत, झरने
घूमे धरती हरी भरी

चंदा मामा जी-भर देखे
लेकिन सूरज नहीं मिला,
अगर कहीं मिलता, उससे भी
बढ़ कर लेते हाथ मिला
खिल-खिल करती मिली चाँदनी
थी तारों से घिरी-घिरी

धऱती, अंबर, सात समंदर
उड़ते-उड़ते कहती थी
देखो-देखो, वहाँ दूर इक
जादूगरनी रहती थी
जो आलू से शेर बनाती थी
मिर्ची से सोन चिरी

कृष्ण शलभ

Sunday, February 16, 2014

टेसू माँगे / कृष्ण शलभ

टेसू माँगे चना-चबेना
माँगे दूध-मलाई जी
गर्मी माँगे हवा सुहानी
सर्दी गरम रजाई जी

टेसू माँगे दीपक बाती
बाँटे ढेर उजाला जी
सूरज बाँटे ढेरों सोना
खोल धूप का ताला जी

टेसू गाये गीत रसीले
करता हल्ला-गुल्ला जी
जाने क्या-क्या गटक गया है
अब माँगे रसगुल्ला जी

मिट्ठू माँगे हरी मिर्च तो,
चिड़िया दाना-पानी जी
बाबा जी से बिल्लू माँगे
किस्से और कहानी जी

कृष्ण शलभ

Thursday, February 13, 2014

अमर कहानी / कृष्ण शलभ

पड़ी चवन्नी तेल में रे, गाँधी बाबा जेल में

चले देश की ख़ातिर बापू
ले कर लाठी हाथ में
सारा भारत खड़ा हो गया
गांधी जी के साथ में
दिखा दिया कितनी ताक़त है सचमुच सबके मेल में

काट गुलामी की जंजीरें
रच दी अमर कहानी
अंग्रेज़ों के छक्के छूटे
याद आ गई नानी
हारी मलका रानी भैया मजा, आ गया खेल में

छोड़ विदेशी बाना, पहनी
सूत कात कर खादी
तकली नाची ठुम्मक ठुम्मक
बोल-बोल आज़ादी
आधी रात चढ़ गया, भारत आज़ादी की रेल में।

कृष्ण शलभ

Friday, February 7, 2014

तोतली बुढ़िया / कन्हैयालाल मत्त

एक तोतली बुढ़िया माई
घुमा रही थी तकली
उसके बड़े पोपले मुंह में
दांत लगे थे नकली

'तोता' जब कहना होता था
कह जाती थी 'टोटा'
'गोता' का 'गोटा' हो जाता
'सोता' बनता 'टोटा'

भोली-भाली शक्ल बनाकर
पहुँचे टुनमुन भाई
काट रही थी जहां बैठकर-
तकली बुढ़िया माई

कन्हैयालाल मत्त

Thursday, January 23, 2014

मत समझो बच्ची / गिरीश पंकज

मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।

काम करूँ मैं पढ़ने का,
सोचूँ आगे बढ़ने का ।
झूठ नहीं, मैं बोलूँ सच्ची ।
मत समझो मुझको तुम बच्ची ।

बन्द करो न मुझको घर में,
जाऊँगी मैं दुनिया भर में ।
कौन बोलता, मुझकों कच्ची ।

मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।

गिरीश पंकज

पेड़ / अश्वघोष

टिंकू से यह बोला पेड़
टिंकू मुझको अधिक न छेड़
शायद तुझ पर काम नहीं
पर मुझको आराम नहीं
देख अभी नभ में जाना है
बादल से पानी लाना है
जीवों को वायु देनी है
मिट्टी को आयु देनी है
ईंधन देना है बुढ़िया को
मीठे फल देना गुड़िया को
अभी बनाना ऐसा डेरा
पक्षी जिसमें करें बसेरा
इंसानों के रोग हरूँगा
और बहुत से काम करूँगा
टिंकू कर मत पीछा मेरा
मैं धरती का पूत कमेरा

अश्वघोष

Thursday, December 5, 2013

चिड़िया रानी, किधर चली / कन्हैयालाल मत्त

चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
किधर चली ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
कुज-गली ।

चिड़िया रानी,
चिड़िया रानी,
पर निकले ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
नीम के तले ।

चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
टी टुट-टुट ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा
चाय-बिस्कुट ।

चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
टा-टा-टा ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
सैर-सपाटा ।

कन्हैयालाल मत्त

Thursday, November 21, 2013

सैर सपाटा / आरसी प्रसाद सिंह

कलकत्ते से दमदम आए
बाबू जी के हमदम आए
हम वर्षा में झमझम आए
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए।

खाते पीते पहुँचे पटना
पूछो मत पटना की घटना
पथ पर गुब्बारे का फटना
तांगे से बेलाग उलटना।

पटना से हम पहुँचे राँची
राँची में मन मीरा नाची
सबने अपनी किस्मत जाँची
देश-देश की पोथी बाँची।

राँची से आए हम टाटा
सौ-सौ मन का लो काटा
मिला नहीं जब चावल आटा
भूल गए हम सैर सपाटा !

आरसी प्रसाद सिंह

Sunday, November 10, 2013

ओ री चिड़िया / कृष्ण शलभ

जहाँ कहूँ मैं बोल बता दे
क्या जाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

चन्दा मामा के घर जाना
वहाँ पूछ कर इतना आना
आ करके सच-सच बतलाना
कब होगा धरती पर आना
कब जाएगी, बोल लौट कर
कब आएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

पास देख सूरज के जाना
जा कर कुछ थोड़ा सुस्ताना
दुबकी रहती धूप रात-भर
कहाँ? पूछना, मत घबराना
सूरज से किरणों का बटुआ
कब लाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

चुन-चुन-चुन-चुन गाते गाना
पास बादलों के हो आना
हाँ, इतना पानी ले आना
उग जाए खेतों में दाना
उगा न दाना, बोल बता फिर
क्या खाएगी, ओ री चिड़िया
उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।

कृष्ण शलभ

Monday, October 7, 2013

नाना जी के साथ चलेंगे / कृष्ण शलभ

नाना जी के साथ चलेंगे , चलो आज तो मेले में

नाना जी के साथ आज सब
बच्चे मेले जायेंगे .
मेले में जी , सारे बच्चे
 चाट- पकौड़ी खायेंगे .
तुम भी चलना साथ करोगे क्या तुम बैठ अकेले में ?

हाँ, हर साल खिलौने वाला
आता शम्भू गेट पर .
वहां खिलौने मिल जाते हैं ,
भैया सस्ते रेट पर .
इक-दो लेंगे , हमें कौन से भर कर लाने ठेले में

कृष्ण शलभ