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Tuesday, December 9, 2014

विगत / कीर्ति चौधरी

यही तो था
जिसे चाहा था
सदा दूसरों के पास देख
मन में सराहा था
’अरे हमारे पास भी यदि होता
तो यह जीवन क्या सँकरी गलियों में
बे हिसाब खोता?
हम भी चलते
उस प्रशस्त राज-पथ पर
बढ़ने वालों के क़दमों से क़दम मिला
बोझे को फूल-सा समझते
हम भी चलते
गर्व से सर ऊँचा किए।

पर जो बीत गए हैं कठिन अभावों के क्षण
कहीं वहीं तो नहीं रह गया
वह सरल महत्त्वाकांक्षी मन
आह ! उसके बिना तो सब अहूरा है
वह हर सपना
जो हुआ पूरा है !

कीर्ति चौधरी

Sunday, December 7, 2014

भाव दो,भाषा प्रखर दो शारदे / ओमप्रकाश यती



भाव दो, भाषा प्रखर दो शारदे
लेखनी में प्राण भर दो शारदे

मेरे मानस का अँधेरा मिट सके
ज्ञान के कुछ दीप धर दो शारदे

सत्य को मैं सत्य खुल कर कह सकूं
ओज दो, निर्भीक स्वर दो शारदे

शब्द मेरे काल-कवलित हों नहीं
पा सकें अमरत्व , वर दो शारदे

मेरे जीवन के हर इक पल को ‘यती’
सर्जना के नाम कर दो शारदे

ओमप्रकाश यती

Saturday, November 29, 2014

मनखान आएगा /अवतार एनगिल

ऐ मेरे उदास सूरज
तुम्हारी धूप
लौटा लाएंगे हम
 

अवतार एनगिल

Thursday, November 27, 2014

बना लेगी वह अपने मन की हंसी / कुमार मुकुल

अक्‍सर वह

मुझसे खेलने के मूड में रहती है

खेलने की उम्र में

पहरे रहे हों शायद

गुडि़यों का खेल भी ना खेलने दिया गया हो

सो मैं गुड्डों सा रहूं

तो पसंद है उसे

मुझे बस पड़े रहना चाहिए

चुप-चाप

किताबें तो कदापि नहीं पढनी चाहिए

बस

मुस्‍कुराना चाहिए

वैसे नहीं

जैसे मनुष्‍य मुस्‍कुराते हैं-

तब तो वह पूछेगी-

किसी की याद तो नहीं आ रही

फिर तो

महाभारत हो सकता है

इसीलिए मुझे

एक गुड्डे की तरह हंसना चाहिए

अस्‍पष्‍ट

कोई कमी होगी

तो सूई-धागा- काजल ले

बना लेगी वह

अपने मन की हंसी

जैसे

अपनी भौं नोचते हुए वह

खुद को सुंदर बना रही होती है



मेरे कपड़े फींच देगी वह

कमरा पोंछ देगी

बस मुझे बैठे रहना चाहिए

चौकी पर पैर हिलाते हुए

जब-तक कि फर्श सूख ना जाए

मेरे मित्रों को देख उसे बहुत खुशी होती

उसे लग‍ता कि वे

उसके गुड्डे को देखने आए हैं

वह बोलेगी-देखिए मैं कितना ख्‍याल रखती हूं इनका

ना होती तो बसा जाते

फिर वह भूल जाती

कि वे उसकी सहेलियां नहीं हैं

और उनके कुधे पर धौल दे बातें करने लगेगी

बेतकल्‍लुफी से

बस मुझे

चुप रहना चाहिए इस बीच

कुमार मुकुल

Friday, November 7, 2014

अन्धे कहार / अवतार एनगिल

रानी जी की डोली उठा
अन्धे कहार चले

अवतार एनगिल

Sunday, November 2, 2014

मेरे बच्चे, मेरे प्यारे / अंजना भट्ट

मेरे बच्चे, मेरे प्यारे,
तू मेरे जिस्म पर उगा हुआ
इक प्यारा सा नन्हा फूल...
क्या है तेरा मुझसे रिश्ता?
बस....एक लाल धागे का...
टूटने पर भी उतना ही सच्चा, उतना ही पक्का
जितना परमात्मा से आत्मा का रिश्ता.
 
तेरी मुस्कुराहटों से जागता है
मेरी सुबहों का लाल सूरज.
तेरी संतुष्टी में ढलता है
मेरी शामों का सुनहरी सूरज.
तेरी हिम्मतों से खिलता है
मेरी रातों का सफेद चंद्रमा.
तेरी खुशियों में झिलमिलाते हैं
मेरी रातों के चंचल तारे.
 
तेरा जीवन सफ़र है मेरी आकाशगंगा
जहाँ तेरी कामयाबी ...है मेरा स्वर्णिम मुकाम वहीँ
जहाँ तू नहीं...वो स्वर्ग हो कर भी मेरे लिए स्वर्ग नहीं.
 
तेरी हिम्मत की बताये रास्तों पर चल कर
उलझने की बजाये तूने अपना रास्ता खुद चुना.
 
मोती मिलेंगे तुझे...मेरे बच्चे...
 
बस जिन्दगी की सिप्पियाँ खुद ही खोल कर देखना होगा.
अंतहीन नीले आसमान की ऊंचाइयो में अकेले पंछी की तरह धीरज से उड़ना होगा.
अपनी रातों के रंगीन सपनों को खुली आँखों से हकीकत में उतारना होगा.
अपनी खामोशियों में मचलते शब्दों को चुन चुन कर गीतों से संवारना होगा.
अपनी राहों में परमात्मा की उंगली थामे बादलों के महलों में छुपे खज़ाने को खुद ही तलाशना होगा.
 
वेदों की सच्चाईओं का आशीर्वाद देती हूँ तुझे...
 
तेरी आँखों में हर पल सूरज की रोशनी जगमगाए
वायू देवता तेरे प्राणों में निरंतर बसें
वाणी में अग्नी सी साफ़ सच्चाई और
चंद्रमा की चांदनी सी मासूमियत तेरे दिल में बसे.
 
ओ परमात्मा ...
मेरे बच्चे के संकल्प मंगलमय कर दे
उसके रोम रोम में चिंतन की काबिलियत भर दे
मेरे बच्चे के मन में सच्चाई, शांती और मुहब्बत भर दे
मेरे बच्चे को अपना प्रिय जान उसका जीवन सुखमय कर दे
अपने रहमों करम की बारिश से मेरे बच्चे के घर में दाने भर दे.

अंजना भट्ट

Thursday, October 23, 2014

एक अकेला अंगूठा / कुमार विजय गुप्त

एक अकेले अंगूठे ने
वसीयत कर दी सारी अंगूठियां
उंगलियों के नाम

रोका, गालों पे लुढ़कते हुए
आंसू की असंख्य बूंदों को

एक अकेले अंगूठे ने
उंगलियों के गासे में भरा हुनर
तलहथ्थियों को दी बित्ता भर लंबाई
हथेलियों को भर मुट्ठी क्षमता

आकाश के ललाट पर बढ़कर लगाया
विजयी भव का सूर्य-तिलक

अंगूठे को पिस्टन बनाकर
हमने भी कई बार उगलवाया
डबडबाए हुए नल के हलक से पानी

शरारती हुए तो काटी चिकोटी
मस्ती में आए तो बजाई चुटकी

अफसोस!
इसी अंगूठे से लिया गया
कोरे कागज पर काला टिप्पा
रची गई हर बार
जीने के हक से बेदखल करने की साजिश

अंगूठे का दर्द वो ही जानें
जिन्होंने जमीन में धंसाया अंगूठा
हल के फाल की तरह
और खांच दी चाहतों की क्यारियां

एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा
दर्द के संबोधन-चिन्ह की तरह
एक बार जरूर खड़ा हुआ होगा
द्रोण के समक्ष भी

इधर अंगूठे ने भी बदले तेवर
दाएं-बाएं डोलकर सिर्फ दिखाता नहीं ठेंगा
बल्कि सफलीभूत होने पर तनकर कहता- डन

ज्यों नाचता लट्टू लोहे के गुने पर
घूमती रहेगी पृथ्वी
अकेले अंगूठे के टेक पर।

कुमार विजय गुप्त

Saturday, October 18, 2014

जंगल-3 / कीर्त्तिनारायण मिश्र

जंगल
तुम
कितने अरक्षित
कितने उत्पीड़ित
कितने अशान्त हो

अभय थे
अरण्य बने
फिर अभ्यारण्य हुए
कितने उदभ्रान्त हो

छाती पर क्या-क्या नहीं उगा लिए
पेड़-पौधे वनस्पतियाँ-औषधियाँ
शाल-सागवान चन्दन-चीड़
सबमें अपनी काया भरी

पक्षियों-वनचरों
बनैलों-विषैलों
पत्थरों-पर्वतों
सबको अपना हृदय-रस पिलाया
शुष्क को सरस
कठोर को कोमल
जड़ को चेतन बनाया

अक्षय भंडार था
तुम्हारे पास जीवन का
तुमने उसे जिया दिया मुक्त हो लुटाया

अब तो तुम
जड़ हो नग्न हो
हन्य हो भक्ष्य हो
तुमने जिन्हें जीवन दिया
उन्हीं के शरण्य हो

जंगल तुम
कितने उत्पीड़ित हो
कितने उद्भ्रान्त हो
कितने अशान्त हो ।

कीर्त्तिनारायण मिश्र

Monday, April 14, 2014

पीले फूल कीकर के / किरण मल्होत्रा

सुर्ख़ फूल गुलाब के
बिंध जाते
देवों की माला में
सफेद मोगरा, मोतिया
सज जाते
सुंदरी के गजरों में
रजनीगंधा, डहेलिया
खिले रहते
गुलदानों में
और
पीले फूल कीकर के
बिखरे रहते
खुले मैदानों में

बंधे हैं
गुलाब, मोगरा, मोतिया
रजनीगंधा और डहेलिया
सभ्यता की जंजीरों में
बिखरे चाहे
उन्मुक्त हैं लेकिन
फूल पीले कीकर के
हवा की दिशाओं
संग संग बह जाते
बरखा में
भीगे भीगे से
वहीं पड़े मुस्कुराते

देवों की माला में
सुंदरी के गजरों में
बड़े गुलदानों में
माना नहीं कभी
सज पाते
फिर भी लेकिन
ज़िन्दगी के गीत
गुनगुनाते

मोल नहीं
कोई उनका
ख्याल नहीं
किसी को उनका
इन सब बातों से पार
माँ की गोद में
मुस्काते
वहीं पड़े अलसाते

किरण मल्होत्रा

Sunday, March 30, 2014

मनखान आएगा /अवतार एनगिल

सहयोगः
         केशव
         मोहन निराश

अवतार एनगिल

अन्धे कहार / अवतार एनगिल

मैंने कहा था
मुझको तो आना है
फिर-फिर आना है
...
तो लो
आता हूं मैं
लेकर अपनी कथा

अवतार एनगिल

Tuesday, February 18, 2014

रोशनाई / किरण मल्होत्रा

 
दुःखों की स्याही
फैल जाए अगर
देती केवल कालिमा

और यही कहीं अगर
कलम में भर ली जाए
करती रोशन

आने वाली पीढियाँ
दीप-सी प्रज्जवलित
आभामान

प्रकाश पुंज-सी
बन कर रोशनाई

किरण मल्होत्रा

Tuesday, January 28, 2014

माँ...क्या एक बार फिर मिलोगी? / अंजना भट्ट

तिनका तिनका जोड़ा तुमने, अपना घर बनाया तुमने
अपने तन के सुन्दर पौधे पर हम बच्चों को फूल सा सजाया तुमने
हमारे सब दुःख उठाये और हमारी खुशियों में सुख ढूँढा तुमने
हमारे लिए लोरियां गाईं और हमारे सपनों में खुद के सपने सजाये तुमने.
 
हम बच्चे अपनी अपनी राह चलते गये, और तुम?
तुम दूर खडीं चुपचाप अपना मीठा आर्शीवाद देतीं रहीं.
पल बीते क्षण बीते....
समय पग पग चलता रहा...अपना हिसाब लिखता रहा...और आज?
 
आज धीरे धीरे तुम जिन्दगी के उस मुकाम पर आ पहुंची
जहाँ तुम थकी खड़ी हो ---शरीर से भी और मन से भी.
 
मेरा मन मानने को तैयार नहीं, मेरा अंतर्मन सुनने को तैयार नहीं...
 
क्या तुम्हारे जिस्म के मिटने से सुब कुछ खत्म हो जायेगा?
क्या चली जाओगी तुम अपने प्यार की झोली समेट कर?
क्या रह जायेंगे हम तुम्हारी भोली सूरत देखने को तरसते हुए?
क्या रह जायेंगे हम तुम्हारी गोदी में छुपा अपना बचपन ढूँढते हुए?
 
बोलो माँ?
क्या कह जाओगी इन चंदा सूरज धरती और तारों से?
इन राह गुज़ारों से.....नदिया के बहते धारों से?
क्या कह जाओगी माँ? किसी सौंप जाओगी हमें माँ?
 
या फिर....? या फिर....?
बिखरा जाओगी अपना प्यार अपनी दुआएं और अपनी ममता
इस कायनात के चिरंतन समुन्दर की लहर लहर पर?
 
क्या इस जनम में चुन पायेंगे हम वो दुआएं?
पर वादा है माँ.....
 
इन सब जनमों के पार हम फिर मिलेंगे
तुम्हारी दुआएं चुन कर.
तुम्हारे प्यार से भरी झोली समेट कर, एक नया जिस्म ले कर
हम फिर मिलेंगे माँ...
जन्म जन्मान्तरों से परे...हंसते मुस्कराते.. हम फिर मिलेंगे
फिर एक नई दुनिया बसाएँगे...
इन बिखरते आंसुओं को चुन कर खुशियों में बदल देंगे
पापा, मै, तुम और बच्चे, हम फिर मिलेंगे, हमेशां साथ साथ खुश रहेंगे.
 
इन शब्दों को लिखते जीते जो आंसू मैने गिराये
और जो तुमने नहीं देखे,
वो आँसू तुम पर मेरा क़र्ज़ हैं माँ....
 
तुम्हें भी ये क़र्ज़ चुकाना होगा
इन बिखरे आँसूओं को समेट कर खुशियों में बदलना होगा
तुम्हें भी एक वाद करना होगा.....
 
क्या फिर से एक बार जन्म जन्मान्तरों के पार मिलोगी?
क्या फिर एक बार मुझसे लाल धागे का रिश्ता जोड़ोगी?
क्या फिर एक बार मुझे अपने तन पर सुन्दर फूल सा सजाओगी?
क्या फिर मेरी नन्हीं उंगली थामे मेरे संग-संग चलोगी?
क्या फिर मेरी वाणी पर अपना सम्मोहन बिखराओगी?
क्या फिर अपनी ममता की छाया से मेरा जीवन संवार दोगी?
क्या फिर अपनी मीठी लोरियां गा कर मुझे सुलाऔगी?
क्या फिर मुझे सजना संवरना और गुनगुनाना सिखाओगी?
क्या फिर मेरे नन्हे पंखों में ऊंची उड़ान भरोगी?
 
बोलो माँ? क्या फिर एक बार मिलोगी?

अंजना भट्ट

Thursday, January 23, 2014

अन्धे कहार / अवतार एनगिल

हे यात्री
भूलना मत
कि यात्रा के पहले चरण में
तुम भी रामायण थे

अवतार एनगिल

Saturday, November 30, 2013

क्यों / कीर्ति चौधरी

ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

उमर बीत जाती है करते खोज,
मीत मन का मिलता ही नहीं,
एक परस के बिना,
हृदय का कुसुम
पार कर आता कितनी ऋतुएँ, खिलता नहीं।
उलझा जीवन सुलझाने के लिए
अनेक गाँठें खुलतीं;
वह कसती ही जाती जिसमें छोर फँसे हैं।
ऊपर से हँसने वाला मन अन्दर-ही-अन्दर रोता है,
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

छोटी-सी आकांक्षा मन में ही रह जाती,
बड़े-बड़े सपने पूरे हो जाते, सहसा।
अन्दर तक का भेद सहज पा जाने वाली
दृष्टि,
देख न पाती
जीवन की संचित अभिलाषा,
साथ जोड़ता कितने मन
पर एकाकीपन बढ़ता जाता,
बाँट न पाता कोई
ऐसे सूनेपन को
हो कितना ही गहरा नाता,
भरी-पूरी दुनिया में भी मन ख़ुद अपना बोझा ढोता है।
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

कब तक यह अनहोनी घटती ही जाएगी?
कब हाथों को हाथ मिलेंगे
सुदृढ़ प्रेममय?
कब नयनों की भाषा
नयन समझ पाएंगे?
कब सच्चाई का पथ
काँटों भरा न होगा?
क्यों पाने की अभिलाषा में मन हरदम ही कुछ खोता है?
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

कीर्ति चौधरी

Tuesday, November 12, 2013

विविधता / किरण मल्होत्रा

पौधों की तरह
लोगों की भी
कई किस्में हैं
कई नस्लें हैं

कुछ लोग
गुलाब की तरह
सदा मुस्कुराते हुए
कुछ रजनीगंधा की तरह
सिर्फ शामों में
महकते हुए
कुछ बरगद की तरह
जीवन की
गहराईयों और
सुदूर आकाश तक
फैले हुए
कुछ घास की तरह
गहराईयों और ऊँचाइयों से
अनभिज्ञ
जीवन की ऊपरी तह तक
सिमटे हुए

कुछ सूरजमुखी की तरह
बाह्यमुखी
कुछ छुईमुई की तरह
अंतर्मुखी
कुछ धतूरे की तरह
जहरीले
कुछ नागफनी की तरह
कंटीले
कुछ सदाबहार की तरह
हरदम साथ निभाने वाले
कुछ मौसमी फूलों की तरह
मौसम के साथ बदलने वाले

प्रकृति
कितनी विविधता
तुममें समाई
बहुत जानकर भी
आँखे कहाँ
जिन्दगी को
ठीक से
समझ पाई

किरण मल्होत्रा

Saturday, November 9, 2013

समुन्दर / अंजना भट्ट

नीले समुन्दर का साया आँखों में भर के
तेरी प्यारी आँखों के समुन्दर में डूबने को जी चाहता है
 
मचलती लहरों की मस्ती दिल में भरके
तेरी बाँहों के झूले में झूलने को जी चाहता है
 
समुन्दर का खारा पानी मूहँ में भरके
तेरे होठों के अमृत की मिठास चखने को जी चाहता है
 
आ ना सजन, अपनी बाँहों में कस ले मुझे
आँखों में बसा ले मुझे, और
अपने होठों की मिठास, मेरे तन मन और आत्मा में भर दे
 
प्यासी हूँ तेरे प्यार की, कभी नहीं थकूँगी तेरे प्यार से
समुन्दर के रूबरू, आकाश की गोद में, पाताल की गहराईयों में....
कहीं भी तू बुलाये तो मैं आऊँगी
जनमों से तेरी दासी हूँ आ कर तुझमें ही समा जाऊँगी

अंजना भट्ट

Wednesday, November 6, 2013

हवा को किस ने देखा है? / अरविन्द कुमार

पेड़ जब शीश नवाते हैँ
पात जब गौरव गाते हैँ
हवा सिंहासन पर चढ़ कर
सवारी ले कर आती है
हवा को सब ने देखा है
 
पतंग जब ऊपर चढ़ता है
ठुमकता है, बल खाता है
हवा तब घुटनोँ पर झुक कर
गीत आशा का गाती है
हवा को सब ने देखा है
 
तितलियाँ चंचल उड़ती हैँ
गुलाबोँ पर मँडराती हैँ
हवा तब बासंती हो कर
गीत यौवन का गाती है
हवा को सब ने देखा है
 
पात जब पीले पड़ते हैँ
शाख से नीचे गिरते हैँ
उड़ते, खड़खड़ करते हैँ
हवा बूढ़ी बन आती है
हवा को सब ने देखा है
 

अरविन्द कुमार

Wednesday, October 30, 2013

कहानी / अंजना भट्ट

वो आया
मेरा मन कुछ भरमाया
इससे पहले कि मै कुछ सोचती
अपने मन को टटोलती या कुछ सपने बुनती
अचानक पाया कि
वो तो था सिर्फ एक साया.
 
सालों बीते
जिन्दगी ने एक दिन फिर सामने ला खड़ा किया
मैने हैरानी से पलकें झपकाईं तो
उसे उसके जीवन साथी के संग पाया,
और वो?
कुछ नया नया सा...
हालांकि पुरुष था,
फिर भी कुछ शर्माता सा पेश आया.
 
मैं अचानक नींद से जागी
सब उमीदें जैसे पर लगा कर भागीं
और मैं जिन्दी के पथरीले धरातल पर आ खड़ी हुई.
तो अब? अब आगे बदना होगा
खुद ही खुद को संभाल कर
नई राहें तलाश करने को चलना होगा.
 
मैं चलती रही
कुछ राहें बनती रहीं, कुछ मैं बनाती रही
वो भी चलता रहा
पुरुष था ना,
उसके लिये राहें आसानी से खुलती रहीं
सालों पर सालों की परतें जमती रहीं.
 
एक दिन फिर मिले
वो ही पुरानी बातें.....पुराने शिकवे गिले
मेरे सपनों की रानी थीं तुम
क्यों तब कुछ नहीं बोलीं थीं तुम?
आज भी तुम्हें पूजता हूँ.
काश...तुम्हारा हाथ थाम कर चला होता
तो सफ़र कुछ अलग अंदाज में ढला होता.
 
मैं फिर हैरान परेशान......
वापिस मन की गहराईयों में उतरी
अपने वर्त्तमान की ऊचाईयों नीचाईयों में भटकी
शायद अभी भी कुछ था
जो कसमसाता था, सवाल करता था
कि ये ना होता तो क्या होता?
वैसा होता तो क्या अच्छा होता?
सवाल तो बहुत थे पर जवाब कुछ ना आया.
 
फिर एक दिन जाना
कि वो मौत से वाबस्ता था
मेरा मन ना रोता था ना हँसता था
फिर भी ना जाने क्यों यूँ ही पल पल तड़पता था.
 
आखिर आ खड़ी हुई परम पिता ईश्वर के द्वारे
माँगी दुआएं,
और बांधी हर ठिकाने मन्नती धागों की कतारें.
जाने मेरे धागे पक्के थे
या फिर मेरी दुआएं सच्चीं
या फिर था बस एक बहाना....
वो मौत के दरवाज़े से
खुदा के रहमों करम में लिपटा लौट आया.
 
जिन्दगी की रफ़्तार बहुत भारी है
वो ही दस्तूर अब फिर से ज़ारी है
अब ना कोई खबर आती है ना जाती है
मगर इतना जानती हूँ कि
आजकल वो फिर से हँसता बसता है
पर हाँ....अब फिर से उसका और मेरा अलग अलग रास्ता है.
 
क्या करें?
खुदा के बन्दे हर नए मोड़ पर एक नया रास्ता तलाशते हैं..
और फिर..
जिन्दगी के सफ़र तो बस अपने अपने ठिकानों पर ही जँचते हैं.

अंजना भट्ट

Tuesday, October 29, 2013

सौ-सौ सूरज / किरण मल्होत्रा

रात के
गहन अंधेरे में
सूरज
अपना वादा
तोड़कर
चांद को
यूँ अकेला
छोड़कर
चल दिया

नज़र के
आसमान से दूर
देखता रहा
चांद
उसके मिटते
निशान को
हर पल
मद्धम हो रहे
उसके प्रकाश को

उसके हर
क़दम के साथ
उसने
एक उम्मीद बांधी
अपने प्रेम की
बेड़ी के साथ
उसके
क़दमों के नीचे
सपनों की नींव डाली

वो कदम
तो नहीं लौटे
जो उस रात
नहीं रूके थे
लेकिन
सपनों के बीजों से
एक घना पेड़
उग आया
जिस पर
एक नहीं
सौ-सौ सूरज उगे थे

किरण मल्होत्रा