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Thursday, January 2, 2014

आंगन के पार द्वार खुले / अज्ञेय

आंगन के पार

द्वार खुले
द्वार के पार आंगन
भवन के ओर-छोर
सभी मिले--
उन्हीं में कहीं खो गया भवन :
कौन द्वारी
कौन आगारी, न जाने,
पर द्वार के प्रतिहारी को
भीतर के देवता ने
किया बार-बार पा-लागन।

अज्ञेय

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