दूर तक बस इक धुंदलका गर्द-ए-तंहाई का था
रास्तों को रंज मेरी आबला-पाई का था
फ़स्ल-ए-गुल रुख़्सत हुई तो वहशतें भी मिट गईं
हट गया साया जो इक आसेब-ए-सहराई का था
तोड़ ही डाला समंदर ने तिलिस्म-ए-ख़ुद-सरी
ज़ोम क्या क्या साहिलों को अपनी पहनाई का था
और मुबहम हो गया पैहम मुलाक़ातों के साथ
वो जो इक मौहूम सा रिश्ता शनासाई का था
ख़ाक बन कर पत्तियाँ मौज-ए-हवा से जा मिलीं
देर से 'अकबर' गुलों पर क़र्ज़ पुरवाई का था.
Thursday, January 2, 2014
दूर तक बस इक धुंदलका / अकबर हैदराबादी
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