(1)
हिफाजत करने वाले खिरमनों1 के मुतमईन2 बैठें,
तजल्ली3 बर्क4 की महदूद5 मेरे आशियाँ तक है।
(2)
सुरूरे-शब6 की नहीं सुबह का खुमार7 हूँ मैं,
निकल चुकी है जो गुलशन से वह बहार हूँ मैं।
(3)
सितम है लाश पर उस बेवफा का यह कहना,
कि आने का भी न किसी ने इन्तिजार किया।
(4)
भला जब्त की भी कोई इन्तिहा है,
कहाँ तक तबिअत को अपनी संभाले।
(5)
विसाले-दायमी8 क्या है, शबे-फुर्कत9 में मर जाना,
कजा10 क्या है, दिली जज्बात11 का हद से गुजर जाना।
Friday, January 3, 2014
शेर-1 / अज़ीज़ लखनवी
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