मेरे आँसू हैं महज
पानी का बुलबुला
और मेरा दर्द
सिर्फ़ मेरा दिमागी फ़ितूर
उनके तमाम कोशिशों के बावजूद
मेरे बचे रहने की ज़िद्द के सामने
धराशायी हो जाते हैं
उनके तमाम नुस्खे और मंसूबे
अपने उन्हीं हत्यारों की ख़ुशी के लिए
रोज़ हँसती हूँ गाती हूँ मैं
जिन्हें सख़्त ऐतराज है
मेरे वजूद तक से
उन्हीं की सलामती की दुआ
रोज़ माँगती हूं मैं
अजनबी होते देश में
रहने की क़ीमत
रोज़ अपना सिर कटा कर
चुकाती हूँ मैं ।
Friday, November 15, 2013
पानी का बुलबुला / उज्जवला ज्योति तिग्गा
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