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Thursday, February 20, 2014

मेरी स्याही / अजन्ता देव

सारे उपादान उपस्थित हैं
मैंने ले लिया है एकान्तवास
प्रहरियों ने कर लिए हैं द्वार बंद
विघ्न का कोई अवसर नहीं

कलंक से भी अधिक
कालिमा है मेरी स्याही में
अपमान से अधिक
तीखी है नोक कलम की
प्रशंसा से अधिक चिकना है काग़ज़
मंत्रबिद्ध की तरह मुग्ध हूँ
स्वयं की प्रतिभा पर
फिर भी क्या है
जो रोक रहा है मुझे
न भूतो न भविष्यति रचने से

क्यों अक्षरों के घूम
लगते हैं भूलभूलैया से
यह कौन सा तिर्यक कोण है
जहाँ अपनी ही आँख
दूसरे की हुई जाती है ।

अजन्ता देव

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