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Wednesday, February 5, 2014

एकलव्य से संवाद-3 / अनुज लुगुन

घुप्प अमावस के सागर में
ओस से घुलते मचान के नीचे
रक्सा, डायन और चुड़ैलों के क़िस्सों के साथ
खेत की रखवाली करते काण्डे हड़म
तुमने जंगल की नीखता को झंकरित करते नुगुरों के
संगीत की अचानक उलाहना को
पहचान लिया था और
चर्र-चर्र-चर्र की समूह ध्वनि की
दिशा में कान लगाकर
अंधेरे को चीरता
अनुमान का सटीक तीर छोड़ा था

और सागर में अति लघु भूखण्ड की तरह
सनई की रोशनी में
तुमने ढूँढ़ निकाला था
अपने ही तीर को
जो बरहे की छाती में जा धँसा था ।

तब भी तुम्हारे हाथों छुटा तीर
ऐसे ही तना था ।

ऐसा ही हुनर था
जब डुम्बारी बुरू से[1]
सैकड़ों तीरों ने आग उगली थी
और हाड़-माँस का छरहरा बदन बिरसा
अपने अद्भुत हुनर से
भगवान कहलाया ।

ऐसा ही हुनर था
जब मुण्डाओं ने
बुरू इरगी के पहाड़ पर[2]
अपने स्वशासन का झंडा लहराया था ।

अनुज लुगुन

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