मन के भीतर मौन बोलता
स्वर की चिर ऊर्म्मिल-लहरों पर
युग-युग का चैतन्य डोलता
मन के भीतर मौन बोलता
अग्नि-पिंड-सा मैं जल उठता
नक्षत्रों का जग बन उठता
निर्मल छाया में चुपके मैं
जीवन की लघु-ग्रंथि खोलता
मन के भीतर मौन बोलता
मैं न बना हूं मिट जाने को
मुरझाता हूं, मुस्काने से
लघु हूं, अपनी सांसों पर
मैं विराट् को आज तोलता
मन के भीतर मौन बोलता
Monday, January 13, 2014
मुरझाता हूं मुस्काने से / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’
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